जलने वाला पुतला एक है, पर रावण अनेक हैं - क्या आपके अंदर भी रावण है? | KFY | Khabar For You
- Khabar Editor
- 20 Oct, 2026
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जलने वाला पुतला एक है, पर रावण अनेक हैं
रावण को जलाने से पहले उसे समझना ज़रूरी है - 10 सबक जो हमें खुद को रावण बनने से बचा सकते हैं
हर साल दशहरे की शाम राजस्थान के हर शहर में एक ही दृश्य दोहराया जाता है - बीकानेर के कुछ ग्राउंड से लेकर जोधपुर के रावण का चबूतरा तक, जयपुर के आदर्श नगर मैदान तक। हजारों की भीड़, हाथों में मोबाइल, आंखों में पटाखों का इंतज़ार। कागज़, बांस और बारूद से बना एक 60 फीट का पुतला खड़ा है। अचानक राम का तीर चलता है, ‘जय श्री राम’ के नारे गूंजते हैं और कुछ ही मिनटों में वह पुतला धू-धू कर जल उठता है।
हम तालियां बजाते हैं। बच्चों को कंधे पर बिठाकर घर लौट जाते हैं। इंस्टाग्राम पर स्टोरी डालते हैं - ‘बुराई पर अच्छाई की जीत।’ और मान लेते हैं कि बुराई का अंत हो गया।
पर क्या सच में बुराई का अंत हुआ? सवाल खुद से पूछिए - जो पुतला जला, क्या वह असली रावण था? या असली रावण आज भी जिंदा है - हमारे दफ्तरों में, हमारे परिवारों में, हमारे अहंकार में, हमारी हवस में, और सबसे ज्यादा हमारे अपने अंदर?
यह संपादकीय रावण को गाली देने के लिए नहीं है। गाली देना सबसे आसान काम है। रावण गाली देने लायक नहीं, समझने लायक था। वाल्मीकि रामायण कहती है - रावण महापंडित था, चारों वेदों का ज्ञाता, छह शास्त्रों का मर्मज्ञ, शिव तांडव स्तोत्र का रचयिता, वीणा का आचार्य, आयुर्वेद और ज्योतिष का विद्वान, और सोने की लंका का चक्रवर्ती सम्राट। ब्रह्मा से वरदान, शिव से अमरता का आशीर्वाद - उसके पास सब था।
फिर भी वह रावण बना। क्यों? क्योंकि ज्ञान होना बड़ी बात नहीं, ज्ञान को जीना बड़ी बात है। और इसीलिए रावण आज भी प्रासंगिक है। अगर इतना ज्ञानी, इतना शक्तिशाली व्यक्ति रावण बन सकता है, तो हम और आप - जिनके पास न उसकी बुद्धि है, न उसकी तपस्या - कितनी आसानी से रावण बन सकते हैं?
इसीलिए इस दशहरे पर एक पुतला जलाने से पहले, रावण के जीवन से 10 सबक याद करना ज़रूरी है - ताकि हम पुतला तो जलाएं, पर खुद पुतला न बन जाएं। और हां, ये 10 सबक धार्मिक प्रवचन नहीं, आज की ज़िंदगी के आईने हैं।
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रावण के 10 सिर: असल में क्या थे?
कहते हैं रावण के 10 सिर उसके 10 विकारों के प्रतीक थे - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और भय। हर सिर एक कमजोरी थी। हम भी अपने अंदर 10 सिर लेकर घूमते हैं - बस हमारे सिर दिखते नहीं, हमारे व्यवहार में दिखते हैं। जब हम गुस्से में चीखते हैं, लालच में झूठ बोलते हैं, या घमंड में किसी को छोटा समझते हैं - तब हमारा एक सिर बाहर आता है।
“रावण बाहर नहीं, भीतर है। जो दूसरों में रावण ढूंढता है, वह कभी राम नहीं बन सकता।” - एक पुरानी लोक उक्ति
10 सबक जो हमें रावण बनने से बचा सकते हैं
01. ज्ञान का अहंकार - सबसे खतरनाक नशा
कथा क्या कहती है? रावण को चारों वेद कंठस्थ थे। उसने कैलाश पर्वत को उठाने की कोशिश की, शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने सिर काटकर चढ़ा दिए - तब जाकर शिव तांडव स्तोत्र की रचना हुई। ब्रह्मा ने उसे वरदान दिया कि नर और वानर के अलावा कोई उसे मार नहीं सकता। इस ज्ञान और वरदान ने उसे अंधा कर दिया। उसे लगा - ‘मुझसे बड़ा ज्ञानी, मुझसे बड़ा तपस्वी कोई नहीं।’ उसने नंदी, वानरों और मनुष्यों को तुच्छ समझा - और अंत में उसी तुच्छ समझे गए मनुष्य (राम) और वानर (हनुमान) ने उसका अंत किया।
आज का रावण कहाँ है?
आज का रावण हर क्लासरूम, ऑफिस और सोशल मीडिया पर है। IIT-IIM की डिग्री आते ही घमंड, सरकारी नौकरी लगते ही रौब, इंस्टाग्राम पर 10k फॉलोअर आते ही ‘मैं ही ज्ञानी’ वाला भाव। हम सुनना बंद कर देते हैं, सिर्फ सुनाना शुरू कर देते हैं। ज्ञान विनम्रता लाता है, पर अहंकार ज्ञान को जहर बना देता है।
सीख: जितना बड़ा ज्ञान, उतनी बड़ी विनम्रता होनी चाहिए। ज्ञान बांटो, जताओ मत।
02. भक्ति बिना चरित्र के केवल दिखावा है
रावण परम शिवभक्त था। रोज़ स्फटिक शिवलिंग का अभिषेक, वेद मंत्रों से पूजा, कठोर तप। पर उसका चरित्र? छल से साधु बनकर सीता हरण, पराई स्त्री पर कुदृष्टि, अहंकार में ऋषियों का अपमान। उसकी भक्ति में शक्ति थी, पर शुद्धता नहीं। शिव ने वरदान दिया, पर साथ नहीं दिया - क्योंकि भक्ति पवित्र मन से फलती है, पाखंड से नहीं।
आज का रावण कहाँ है?
सुबह मंदिर, शाम को बेईमानी। माथे पर तिलक, जुबान पर गाली। सोशल मीडिया पर ‘जय श्री राम’ की पोस्ट और ऑफिस में रिश्वत, घर में औरतों का अपमान। हम भगवान को फूल चढ़ाकर सोचते हैं हिसाब बराबर हो गया। भगवान को प्रसाद नहीं, आपका व्यवहार चाहिए।
सीख: मंदिर जाना धर्म नहीं, अच्छा इंसान बनना धर्म है। भक्ति आचरण में दिखे तो सच्ची है।
03. किसी की ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ ही होता है
वाल्मीकि रामायण में सीता हरण केवल अपहरण नहीं, अहंकार का चरम था। रावण को लगा - जो मुझे चाहिए, वह मेरी होनी ही चाहिए। उसने वेदवती और नलकुबेर की पत्नी रंभा के श्रापों को भी अनसुना किया था, जिसमें कहा गया था कि पराई स्त्री को छूते ही उसका विनाश होगा। वह श्राप अंत में सच हुआ। सीता को अशोक वाटिका में रखकर भी वह रोज़ मनाने जाता, पर सीता ने तिनके की ओट से भी उसे कभी स्वीकार नहीं किया।
आज का रावण कहाँ है?
आज का रावण हर जगह है - जो ‘ना’ सुनकर भी पीछा नहीं छोड़ता। कॉलेज में स्टॉकिंग, रिश्ते में ज़बरदस्ती, दफ्तर में पावर का गलत इस्तेमाल, सोशल मीडिया पर अश्लील मैसेज। प्रेम में अधिकार नहीं, सम्मान होता है। जहाँ सहमति नहीं, वहाँ प्रेम नहीं, अपराध है।
सीख: प्रेम में जिद नहीं, इज्ज़त होती है। किसी की ‘ना’ का सम्मान करना ही सबसे बड़ी मर्दानगी है।
04. अपनों की कड़वी सलाह ठुकराना - विनाश का पहला कदम
रावण के दरबार में तीन लोगों ने उसे सबसे ज्यादा टोका - पत्नी मंदोदरी, भाई विभीषण और मामा मारीच। मंदोदरी ने बार-बार कहा - ‘सीता को लौटा दो, राम से बैर मत लो।’ विभीषण ने धर्म का हवाला दिया तो रावण ने भरी सभा में उसे लात मारकर निकाल दिया। मारीच ने कहा - ‘राम साधारण मानव नहीं’, तो उसे भी डरपोक कह दिया। नतीजा? जब युद्ध हुआ, तो रावण के साथ कोई अपना नहीं बचा - सिर्फ चापलूस बचे, जो ‘महाज्ञानी की जय’ कहते रहे।
आज का रावण कहाँ है?
हम भी वही करते हैं। पत्नी टोके तो ‘तुम नहीं समझती’, माता-पिता समझाएं तो ‘आप पुराने ख्याल के हो’, सच्चा दोस्त सच बोले तो उससे दूरी बना लेते हैं। और पास रखते हैं उन लोगों को जो हर बात पर ‘भाई, तुम सही हो’ कहते हैं। याद रखिए - जो आपको टोकता है, वही आपका है।
सीख: चापलूस तालियां बजवाते हैं, पर डुबोते भी वही हैं। सच्चे लोगों को सुनना सीखो।
05. बदले की आग पहले खुद को जलाती है
सूर्पणखा के नाक-कान कटने की घटना के बाद रावण के पास दो विकल्प थे - बहन को समझाना या युद्ध टालना। पर उसने बदला चुना। बदले के लिए उसने मारीच की मदद से सीता का हरण किया। एक बदले ने पूरे कुल को खा लिया - कुंभकर्ण, मेघनाद, पूरा राक्षस वंश खत्म। बदला कभी एक घटना पर खत्म नहीं होता, वह पीढ़ियों तक चलता है।
आज का रावण कहाँ है?
आज हम एक अपमान का बदला लेने के लिए सालों तक मुकदमे लड़ते हैं, परिवारों में बोलचाल बंद कर देते हैं, सोशल मीडिया पर बदनाम करते हैं। गुस्सा एक दिन का होता है, बदला जीवन भर का बोझ।
सीख: बदला न्याय नहीं दिलाता, सिर्फ घाव गहरा करता है। माफ करना कमजोरी नहीं, सबसे बड़ी ताकत है।
06. शक्ति का नशा - सबसे बड़ा भ्रम
लंका सोने की थी, पुष्पक विमान था, काल तक को बंदी बना रखा था - ऐसी शक्ति पाकर रावण को लगा अब कोई उसे हरा ही नहीं सकता। उसने देवताओं को हराया, नवग्रहों को अपने सिंहासन के पायों से बांधा। पर शक्ति जब सेवा के लिए नहीं, दिखावे के लिए इस्तेमाल हो, तो वह श्राप बन जाती है। राम के पास लंका जैसी शक्ति नहीं थी, पर मर्यादा थी - और वही जीती।
आज का रावण कहाँ है?
आज शक्ति के रूप बदल गए हैं - पद, पैसा, पहुंच, फॉलोअर्स। पार्षद बनते ही रौब, सरकारी कुर्सी मिलते ही रिश्वत, बॉस बनते ही कर्मचारियों पर चिल्लाना। शक्ति मिली है तो जिम्मेदारी समझो, हथियार नहीं।
सीख: शक्ति का सही उपयोग सेवा है, गलत उपयोग रावणत्व है।
07. हर रिश्ते की एक लक्ष्मण रेखा होती है
रावण ने हर मर्यादा तोड़ी - साधु का वेश धरकर छल किया, मेहमान बनकर धोखा दिया, भाई को अपमानित कर निकाला। राम ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ इसलिए कहलाए क्योंकि उन्होंने हर रिश्ते की रेखा का सम्मान किया - पिता के वचन के लिए राज छोड़ा, भाई के लिए युद्ध किया। एक ने रेखा लांघी तो विनाश हुआ, दूसरे ने रेखा निभाई तो इतिहास बना।
आज का रावण कहाँ है?
हम भी रोज़ रेखाएं लांघते हैं - विश्वास तोड़ना, पीठ पीछे बुराई करना, रिश्तों में झूठ बोलना। ऑफिस में क्रेडिट चुराना, दोस्ती में धोखा देना। हर रिश्ते की एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा होती है - उसे पार करते ही भरोसा जल जाता है।
सीख: मर्यादा बंधन नहीं, रिश्तों का सुरक्षा कवच है।
08. गलती को सही ठहराना - सबसे बड़ी गलती
रावण को युद्ध के आखिरी दिन तक पता था कि वह गलत है। मंदोदरी रो रही थी, विभीषण राम के साथ था, हनुमान लंका जला चुके थे - सब संकेत थे। पर रावण ने हर बार एक नया तर्क दिया - ‘मैं ब्राह्मण हूं, मुझे कोई नहीं मार सकता’, ‘मैंने तप किया है’। उसने गलती मानी ही नहीं। और जो गलती मानता नहीं, वह सुधरता भी नहीं।
आज का रावण कहाँ है?
हम भी यही करते हैं - ‘मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसने वैसा किया’, ‘मेरी मजबूरी थी’। गलती मानने में शर्म नहीं, हिम्मत चाहिए। जो माफी मांग लेता है, वह छोटा नहीं, बड़ा बनता है।
सीख: गलती मान लेना हार नहीं, सुधार की पहली जीत है।
09. सबको नियंत्रित करने की जिद - प्रेम की दुश्मन
रावण सब पर अधिकार चाहता था - सीता पर, देवताओं पर, यहाँ तक कि यम और काल पर भी। वह चाहता था कि पूरी सृष्टि उसके इशारे पर चले। पर प्रेम अधिकार से नहीं, स्वतंत्रता से बढ़ता है। सीता को अशोक वाटिका में बंद करके वह उनका शरीर रोक पाया, मन नहीं। नियंत्रण से डर पैदा होता है, प्रेम नहीं।
आज का रावण कहाँ है?
आज हम भी अपने पार्टनर का फोन चेक करना, बच्चों के हर फैसले पर रोक लगाना, कर्मचारियों पर हर समय नजर रखना - इसे प्यार या अनुशासन समझते हैं। असल में यह डर है - खो देने का डर। पर याद रखिए, जो जितना बांधोगे, वह उतना टूटेगा।
सीख: रिश्ते पकड़ने से नहीं, संभालने से टिकते हैं। भरोसा दो, नियंत्रण नहीं।
10. अंतिम सांस तक सुधरने का मौका होता है
रामायण का सबसे मार्मिक प्रसंग - जब रावण मृत्युशैया पर था, तो श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा - ‘जाओ, रावण से नीति और ज्ञान लेकर आओ। वह महापंडित है।’ लक्ष्मण सिर के पास खड़े हुए तो रावण ने कुछ नहीं कहा। राम ने समझाया - ‘ज्ञान लेने सिर के पास नहीं, चरणों में जाओ।’ लक्ष्मण चरणों में गए तो रावण ने तीन अंतिम बातें कहीं - 1. शुभ काम में देरी मत करो, 2. अशुभ काम को टालो, 3. अपने शत्रु को कभी छोटा मत समझो। सोचिए, अंत में भी रावण गुरु बन गया - पर जीवन भर वह अपना ज्ञान जी नहीं पाया।
आज का रावण कहाँ है?
हम भी सोचते हैं - ‘कल से बदलूंगा’, ‘अगले साल से गुस्सा कम करूंगा’। कल कभी नहीं आता। रावण ने भी सुधरने में देर कर दी। हमारे पास अभी समय है - आज, अभी।
सीख: पुतला जलने से पहले मन का अहंकार जला लो - यही सच्चा दशहरा है।
विशेष: रावण के 10 सिर - हमारे 10 दुश्मन
पंडितों के अनुसार रावण के 10 सिर प्रतीक हैं: 1. काम (वासना) 2. क्रोध 3. लोभ 4. मोह 5. मद (घमंड) 6. मत्सर (ईर्ष्या) 7. अहंकार 8. द्वेष 9. छल 10. भय।
इनमें से हर व्यक्ति के अंदर 2-3 सिर हमेशा सक्रिय रहते हैं। दशहरा हमें याद दिलाता है - हर साल एक-एक सिर कम करो, तभी रामत्व आएगा।
“रावण को मारना आसान है, राम को जीना कठिन है। रावण एक दिन में जलता है, राम बनने में जीवन लगता है।”
संपादक की कलम से - मैं यह क्यों लिख रहा हूँ?
यह संपादकीय किसी धर्मग्रंथ का प्रवचन नहीं है। यह एक आईना है। Khabar For You हमेशा हाइपर-लोकल खबरों के साथ-साथ समाज के आईने की भूमिका निभाना चाहता है। बीकानेर में जब हम ‘The 3 AM Broadcast’ जैसे नए प्रयोगों की खबरें करते हैं, या नवरात्रि के गरबा की कवरेज करते हैं - तब हमें लगता है कि त्योहार सिर्फ नाच-गाने और मेलों का नाम नहीं, आत्ममंथन का भी अवसर है।
आज जब हम बीकानेर के कई मैदान, जोधपुर के घंटाघर या जयपुर के दशहरा मेलों की चमक देख रहे हैं, तो एक पत्रकार के नाते सवाल उठाना हमारी जिम्मेदारी है - क्या हम सिर्फ उत्सव मना रहे हैं या खुद से सवाल भी कर रहे हैं? हर साल एक पुतला जलाकर हम खुद को राम समझ लेते हैं। पर सच यह है कि राम बनना तपस्या है और रावण बनना बहुत आसान।
गुस्सा, घमंड, लालच और ‘मैं ही सही हूँ’ - ये चार चीज़ें ही काफी हैं किसी को भी रावण बनाने के लिए। और सोशल मीडिया के दौर में तो रावण बनना और भी आसान हो गया है - बिना सोचे ट्रोल करना, बिना सच जाने बदनाम करना, बिना मेहनत के दूसरों को नीचा दिखाना - ये सब नए जमाने के रावणत्व हैं।
इसीलिए यह लिखा - ताकि दशहरे की अगली सुबह जब राख ठंडी हो जाए, तो एक सवाल गर्म रहे - क्या मैंने अपने अंदर के एक भी रावण को मारा? इसीलिए इस संपादकीय का शीर्षक है - जलने वाला पुतला एक है, पर रावण अनेक हैं।
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इस
दशहरे पर एक संकल्प लीजिए मैदान में खड़ा पुतला तो हर साल जलेगा। असली विजयादशमी
उस
दिन
होगी, जलने वाला पुतला एक है, और रावण अनेक हैं। — Khabar Editor, Khabar For You | आपकी राय का स्वागत है:
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